सोमवार, 17 जनवरी 2011

सिंहनाद:पंडित कुमार गंधर्व

मालवा की मिट्टी से जुड़े महान शास्त्रीय गायक पंडित कुमार गंधर्व(शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकाली)


पंडित कुमार गंधर्व (शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकाली)
जन्म - कर्नाटक के धारवाड़ में 8 अप्रेल 1924
पुणे में प्रोफेसर देवधर और अंजनी बाई मालपेकर से संगीत की शिक्षा।

दस बरस की उम्र से ही संगीत समारोहों में गाने लगे थे और ऐसा चमत्कारी गायन करते थे कि उनका नाम कुमार गंधर्व पड़ गया ।



अपने मूल शैली और अपने को हिंदुस्तानी संगीत की परंपरा घराने के दायरे के भीतर रहने के इनकार उन्हें एक विवादास्पद व्यक्ति बना दिया। हालांकि कभी भी कुमार साहब के समर्पण, समझ और बौद्धिक और भावनात्मक गहराई पर सवाल नहीं उठाया गया है, यह सच है कि वह अपने समकालीन भीमसेन जोशी और मल्लिकार्जुन मंसूर के जितनी लोकप्रियता की ऊंचाई प्राप्त नहीं कर सके। क्यूकी उन्हे टुकड़ो मे सुनना कभी भी आसान नहीं रहा है उनकी आवाज मे पतलापन और कभी कभी कठोर आवाज दोनों रही

वे जब इंदौर आए तो चौबीस बरस के थे ।लेकिन इंदौर वे गाना गाने नहीं मालवा की समीशीतोष्ण जलवायु में स्वास्थ लाभ करने आए थे । उन्हें टी .बी थी जिसका उन दिनों कोई पक्का इलाज़ नहीं था बीमारी के चलते उनका एक फेफड़ा निकाल दिया गया था। उम्र थी सिर्फ 25 बरस, और गाने से मनाही की सख्त चिकत्सीय हिदायत। कुमार जी की पत्नी भानुमती ख़ुद एक गायिका थीं और कुशल गृहणी एवं नर्स भी।
अपने देवास मे स्वास्थ्य लाभ के दौरान उन्हे एक गौरया से प्रेरणा मिली,गौरया अपने छोटे आकार के बावजूद प्रभावशाली आवाज की मालकिन होती है।

कुमार जी स्वस्थ होकर फिर से वह नई तरह का गायन कर सके इसका श्रेय भानुताई को ही दिया जाना चाहिए ।
जिस घर में कुमार जी स्वास्थ लाभ कर रहे थे ,तब वेह देवास के लगभग बाहर था, और वहां हाट लगा करता था ।कुमार जी ने वहीं बिस्तर पर पड़े पड़े मालवी के खांटी स्वर महिलाओं से सुने । वहीं पग- पग पर गीतों से चलने वाले मालवी लोक जीवन से उनका साक्षातकार हुआ ।

संगीत वे सीखे हुए थे और शास्त्रीय गायक में उनका नाम भी था ।लेकिन स्वस्थ होते हुए और नया जीवन पाते हुए उनमें एक गायक का भी जन्म हुआ ।

सन 1952 के बाद जब वे चंगे होकर गाने लगे तो पुराने कुमार गन्धर्व नहीं रह गये थे ।

मालवा के लोक जीवन से कुमार जी के साक्षात्कार पर देशपांडे ने लिखा ,
"बिस्तर पर पड़े-पड़े वे ध्यान से आसपास से उठने वाले ग्रामवासियों के लोकगीतों के स्वरों को सुना करते थे ।वे उन लोकगीतों और लोक धुनों की और आकर्षित होते चले गये ।इसे में से एक नये विश्व का दर्शन उन्हें प्राप्त हुआ ।"

अड़सठ बरस की उम्र में 12 जनवरी 1992 में देवास में उनका निधन हो गया । लोक संगीत को शास्त्रीय से भी ऊपर ले जाने वाले कुमार जी ने कबीर को जैसा गया वैसा कोई नहीं गा सकेगा ।

कालिदास और कुमार गन्धर्व मालवा के दो संस्कृतिक दूत हैं।

निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊंगा
सुनता है गुरु ज्ञानी ।
उड जाएगा हंस अकेला ।
एक घड़ी।
कोण ठगवा नगरिया लुटल हो।
अवधुता ...।
उठी उठी सखी सब मंगल गाओजी ..।
म्हारे नेणा आगे राहियों जी जी जी ..।
नेहरवा हमका न भावे...।

ॐ तत सत

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