सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

मालवा की मीरा : चन्द्रसखी


मालवा की मीरा : चन्द्रसखी



श्रीकृष्ण हजारो वर्षो से भारतीय जनमानस मे व्यक्त और अव्यक्त रूपो मे व्याप्त है। कृष्णभक्त भी असंख्य है, लेकिन इनमे राजस्थान की कवियत्री संत मीराबाईका अलग ही स्थान है। मीराबाई के पदो को तलाशते हुआ डा.सहगल के लेख पर निगाह पड़ी,जो मालवा के एक विलक्षण कृष्णभक्त पर था। नाम था चंद्रसखी। पूरन जी ने उन्हे टाइटल दिया था "मालवा की मीरा"। जानते जानते मन स्वतः इस मालवी संत के आगे नतमस्तक हो गया।

मालवा की उत्तरी-पश्चिमी सीमा मीरा के मूल अंचल मेवाड से जुड़ी हुई है।वर्तमान मे यह क्षेत्र रतलाम के जावरा और राजस्थान के प्रतापगढ और सादडी तक फैला हुआ है। ये दोनों सिमाए सगी बहनो सी प्रतीत होती है। यह अंचल दशपुर कहलाता है, वही दशपुर जिसे लंकानरेश रावण का ससुराल माना जाता है।

कलिसिन्ध,शिवना,चंबल यहा की प्रमुख नदियाँ है।चम्बल के किनारे एक गाँव था "बर्रामा" यह देवडा राजपूतों की जागीरदारी में था।"बर्रामा" गाँव चम्बल तट पर वर्तमान खड़ावदा तहसील गरोठ जिला मंदसौर का गाँव था। बर्रामा में चारण (कछेला), गुर्जर, कीर और अहीरों की बस्ती थी। अन्य अनेक गाँवों में यह गाँव भी गाँधी सागर जल प्रसार में डूब गया।

बर्रामा के लोगो का मुख्य व्यवसाय था गौ चारण। वही गाँव के कछेला समाज के एक परिवार की एक बेटी थी जिसका नाम था - रूपकुँवर। यही रूपकुँवर बाद में चन्द्रसखी नाम से प्रसिद्ध कृष्ण भक्त कवयित्री के नाम से जानी गई।

चन्द्रसखी चम्बल के तट पर गाय चराती थी। उसके ही एक पद से यह ज्ञात होता है कि, रूपकुँवर ने किसी विधर्मी के पंजे से मुक्त होने के लिए कृष्ण से अपनी रक्षा हेतु प्रार्थना की थी। रूपकुँवर की माँ जगकुँवर भी कृष्ण भक्त थी दोनों माँ बेटी कृष्ण के भक्तिगीत गया करती थी। उन दिनों एक कृष्ण भक्त संत वेशधारी वृद्धा बर्रामा में आई। जो कई महीने बर्रामा में रही। उसी वृद्धा संत का प्रभाव रूपकुँवर पर पडा। वह संत भक्त ही एक प्रकार से रूपकुँवर की प्रेरक भी थी। उसी ने उसे कृष्ण की सखी चन्द्रावली (चन्द्रावली कृष्ण की अनन्य भक्त थी)का अवतार घोषित किया और रूपकुँवर को ’चन्द्र‘ (कृष्ण) की सखी - ’चन्द्रसखी‘ नाम से पुकारना शुरू किया। इसके पश्चात वह चन्द्रसखी नाम से ही पुकारी जाने लगी। उसका विवाह राजस्थान के ढाणी गाँव में हुआ था। जहाँ से वह किन्हीं कारणों से वापिस ’बर्रामा‘ लौट आई और फिर अपनी वृद्धावस्था तक ’बर्रामा‘ में रहकर अपना पैतृक कार्य गोचारण करती रही।इन पदों के आधार पर इतना तो कहा जा सकता है कि चन्द्रसखी (रूपकुँवर) ससुराल नहीं जाना चाहती थी। ससुराल वाले मारवाड से बार-बार आकर उसे हठात् ले जाना चाहते थे।
एक लोकश्रुति के आधार पर एक बार उसका भाई उसे ससुराल छोडने गया था। जब दोनों उसके ससुराल ढाणी (मारवाड) पहुँचे तब रूपकुँवर के साथ इतनी ज्यादतियाँ की गईं कि वह घबरा कर अपने भाई को साथ ले घोडे पर सवार होकर रातोंरात वहाँ से भाग निकली। मार्ग में किसी पठान जागीरदार ने उन्हें घेर लिया। द्वन्द्व युद्ध में उसका भाई वीरगति को प्राप्त हो गया। रूपकुँवर काल कोठडी में कैद कर ली गई। तब उसने एक भजन गाकर कृष्ण से अपनी रक्षा के लिए आर्तवंदना की। कहते हैं कि उसकी आर्तवंदना सुनकर स्वयं कृष्ण उसके भाई के रूप में वहाँ आए और रूपकुँवर को पठान की काल कोठरी से मुक्त करवा कर ’बर्रामा‘ की सीमा तक छोड गए। जब रूपकुँवर को भान आया कि उसका भाई तो वीरगति को प्राप्त हो चुका था। फिर मुझे छुडवाने वह कैसे आया ? उसने पीछे मुडकर देखा तो वहाँ कोई नहीं था। तब से रूपकुँवर ने कृष्ण को भाई के रूप में स्वीकार किया और इसी रूप में उनकी भक्ति के भजन गाए। रूपकुँवर का आर्तभजन सारी व्यथाकथा कहता है

आणपडी आफत घणीए सुणो द्वारकाधीश।
लाज बचाओ दौड नेए झट आओ जगदीश।।
अंग.अंग घायल हुओए मन रा होया टूक।
विरद राखजो साँवराए पड नी जावे चूक।।
अपणा सब वैरी हुआए दगो कमायो मूल।
पत राखो पत राखणाए विरद न जाजो भूल।।
कारा भीतर फँस पडीए हेलो सुण लो नाथ।
मूँ अनाथ सरणे हुईए धरो सीस पे हाथ।।
बीधर्मी छल कर लियोए धाराँ लाग्यो वीर।
कै तो पत राखो तुरतए कै हत करूँ सरीर।।
अस्व मर्यो वीरो मर्योए घायल हुओ सरीर।
पत घायल मत होण देए रे हलधर रा वीर।।
परदेसाँ विपदा पडीए कोई न राखण हार।
प्रगट होय रिछा करोए केसव क्रसन मुरार।।
रूपकुँवर की वीणतीए सुणो द्वारका राव।
भँवर बीच डूबण हुईए पार लगाओ नाव।।


चन्द्रसखी ने अपने अपने पदों में चम्बल का भी उल्लेख किया है।
चाम्बल कनारे म्हारो गाँव, साँवरिया आइ जा रे।

चाम्बल कनारे म्हारी ओछी हेवली।
मूँ हूँ मालवा री गाम गंवेली।।

चन्द्रा गंवेली म्हारो नाम। राधा रंगीली म्हारो नाम।।
ललता रसीली म्हारो नाम। चाम्बल कनारे म्हारो गाम।।
चाम्बल कनारे म्हारी छोटी से टापरी।
छोटी सी टापरी, छायादार छापरी।।
छापरी में रे वे थारी, बेना बाई खापरी।

जमना ने जाणे वसी चाम्बल ने जाणजे।

चाम्बल री चट्टान बेठ तू मुरली मधुर वजा जारे।

चाम्बल का पाणी सूँ, कान्हा ने मूँ हपडाऊँ।

चाम्बल कनारे कान्हा बाँसरी बजाओ।
चम्बल की तरह चन्द्रसखी ने "खेजड़ी" वृक्ष का वर्णन भी अपने पदों में किया है। मालवा में यह वृक्ष पूज्य वृक्षों में माना जाता है। विवाह के अवसर पर खेजड़ी की पूजा अनिवार्य मानी जाती है। यह वृक्ष मालवा में (कल्पवृक्ष) की भाँति मान्य है। वैसाख और जेठ महीने में जब सभी वृक्ष विशेषकर चम्बल (अरावली) वन के वृक्ष निपाते हो जाते हैं तब खेजड़ी हरियाता है।इसकी आयु 100 वर्षो से भी अधिक होती है। इस वृक्ष की छाया गोचारकों और पशुओं के लिए वरदायी होती है। खेजड़ी की पत्तियाँ और फलियाँ पशुओं का पेट भरती हैं। खेजड़ी के पेड़ पर संगरि नमक फल लगता है जो काफी महंगा होता है। चन्द्रसखी ने खेजड़ी वृक्ष का उल्लेख बार-बार अपने पदों में किया है।

गायाँ चरावाँ, कान्हाँ बन, बन डोलाँ
दपोरी तो काटाँ, हरिया खेजडा के नीचे।
म्हारो हेलो सुणो बनवारी, कांदा रोटी खा जाओ।।

नी छावे म्हने कलप रूखडो। (कल्पवृक्ष)
घणी शीतली खेजडा की छाँव।।

कल-कल, कल-कल चाम्बल वेवे, जल मुरगाबी रोर करे।
खेजडाला री ठंडी छायाँ, बेठ फागण्यो गा जा रे।।

चन्द्रसखी ने जीवित रहते जहाँ खेजडे को कदंब और कल्पवृक्ष से भी श्रेष्ठ बताया है वहीं अपनी मृत्यु के समय उसने अभिलाषा की है कि ’’जब वह गोकुल में जमना के तट पर प्राण त्याग रही हो तब उसके कृष्ण हों। राधा एवं समस्त सखियाँ हों। उसकी गाएँ उसके आसपास खडी रंभा रही हों। हाथ में अलगोजा हो। अलगोजा बजाते-बजाते रोम-रोम से कृष्ण के गुणगान करते हुए प्राण छूटे।‘‘ आगे वह कहती है-
’’हे कृष्ण मेरी चिता करील और खेजडे की लकडी की चुनवाना और राख को जमना और चम्बल में बहा देना।‘‘
भले ही चन्द्रसखी अपने अंतिम दिनों में चम्बल तट से चलकर ’मुलक मालवा‘ छोडकर गोकुल चली गई थी। वहीं जमना किनारे अपनी कुटिया बनाकर निवास करने लगी थी। किन्तु चम्बल और खेजडे के प्रति उसकी निष्ठा और मोह बना रहा। चन्द्रसखी ने अपने चम्बल और खेजडे का उल्लेख तो किया ही है। यहाँ के वनफल ’करौंदा‘ और ’टीमरू‘ का भी उल्लेख किया है। ’खाँखरा‘ (पलास) तथा अन्य वृक्षों का भी उल्लेख किया है। मालवा के प्रसिद्ध भोजन ’दाल-बाटी‘ तथा मुख्य भोजन ’मक्का का घाट‘ और ’राबडी‘ का उल्लेख भी चन्द्रसखी ने पूरे सम्मान के साथ किया है। यहाँ तक कि गरीब के भोजन ’काँदा रोटी‘ को भी याद रखा है।

मालवा की बेटी चन्द्रसखी चम्बल किनारे छोटे से गाँव ’बर्रामा‘ के एक कच्चे घर में रहती थी और जंगल में चम्बल के तट पर ’मालवी गाएँ‘ चराती हुई, कृष्ण के पद गाती-रचती, गुनगुनाती, अलगोजा बजाती हुई मगन रहती थी। अलगोजा बांस सुपारी या कंगोर की लकड़ी का बना होता है जिसमे दो अलग अलग बाँसुरीनुमा नलिया होती है जिसमे 4 - 7 छेद किए जाते है बिना साधना किए अलगोजे पर उंगलिया सुगमता से नहीं चलती है। चन्द्रसखी रात दिन कृशनभक्ति मे लीन रहती। न उसे दुनिया की परवाह थी और न दीन की। कृष्ण ही उसकी दुनिया था और कृष्ण ही दीन था। मालवा उसका ’मुलक‘ था। उसने बार-बार कृष्ण से चम्बल के तट पर आने की प्रार्थना आए। तब उसने कृष्ण से कहा, ’’मैं ही मालवा छोडकर गोकुल आकर बस जाऊँ। तब तो दर्शन दोगे ?‘‘
छोड मालवो चाल पडू आ पउँचू गोकुल धाम।।
- तथा -
छोड मालवो अब तो हेली, बिंदराबन सुख लेवाँ।
और चन्द्रसखी अपने कृष्ण से मिलने की चाह लिए एक दिन अपनी गाएँ घेर कर कृष्ण के ’देस‘ चल पडी।
कृष्ण के ’मुल्क‘ गोकुल के लिए रवाना हो गई।
मुलक मालवो छोड कन्हैया, आई थारे देस।
मालवा उसने बहुत विवशता से छोडा। कृष्ण हठ नहीं ठानते तो वह चम्बल तट कभी नहीं छोडती। चम्बल तट पर तो उसकी गाएँ चरती थीं। बहुत विवशता के बाद उसने मालवा और चम्बल तट छोडा। उसकी विवशता स्वाभाविक भी थी।
गोपालो, गोकुल किसतर आऊँ। मालवो नी छोड पाऊँ।
थाँने तो काना, जमना जी आछा लागे,
म्हाने आछी लागे कान्हा, चम्बल की झाऊँ।
कान्हा से मिलने की चाह उसे ब्रज ले गई।


चन्द्रसखी के दो पदों में इंदौर की होल्कर रानी अहिल्या बाई का उल्लेख आता है। अहिल्या बाई का समय सन् १७६७ से १७९५ . रहा है। जब कुछ लोगों ने चन्द्रसखी को समझाया कि, तुम अहिल्या माता के दरबार में जाकर उन्हें अपने भजन सुनाओ (अहिल्या माता का दरबार भानपुर में लगता था। बर्रामा यहाँ से निकट था वह होल्कर राज्य का ही एक गाँव था।) वे प्रसन्न होकर तुम्हें जागीर निकाल देंगी। तब चन्द्रसखी ने मना करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा -

अलगोजो नी वजाऊँ, कणके आगे।
माथे नी नमाऊँ कण के आगे।।
मात आइल्या सिवजी ने ध्यावे,
मूँ ध्याऊँ म्हारो कान्हो।


बर्रामा की धरती भक्तों, संतों और कवियों की धरती है। अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के पीठाधीश्वर स्वामी निर्भयराम जी महाराज इसी बर्रामा के प्रसिद्ध परम रामभक्त व्यक्तित्व थे। चार्वाक परम्परा के एक संत चर्मक ऋषि भी इसी गाँव बर्रामा के ही संत थे। जिनकी समाधी प्रसिद्ध पौराणिक तीर्थ शंखोद्धार में थी। चम्बल तट तो कवियों संतों की जन्मस्थली रही है। भील समुदाय कथा गाथा से यह आभास मिलता है कि महाकवि कालिदास चम्बलतट पर बसे गाँव सखन-सुजानपुरा के थे। यही उनका जन्म हुआ। शिक्षा-दीक्षा हुई और यहीं पर उन्होंने प्राण त्यागे।
बार्रामा के ही एक संत ठाकुर शिवदान सिंह जी चारण के अनुसार "काव्य रचना हम कछेलों के संस्कारी रक्त में है। हमारी स्त्रियाँ तो काव्य रचना के लिए प्रसिद्ध रही हैं। स्वयं निर्भय राम जी एवं चर्मक जी कछेला चारण थे। हम कछेला लोग मूल रूप से कच्छ के हैं। गोचारण हमारा मुख्य व्यवसाय है। कृष्ण भी गोचारक ही थे। द्वारका क्षेत्र हमारा क्षेत्र है।
इस प्रकार हमारा व्यवसाय और मूल स्थान तथा कृष्ण का सत्ता क्षेत्र एक ही था। कृष्ण के अनेक रूप हैं। वे योगियों में श्रेष्ठ योगी हैं तो रसिकों में श्रेष्ठ रसिक। वे सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में हैं। चन्द्रसखी को तो कृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हुए थे। एक बार तो मुसीबत की मारी चन्द्रसखी को स्वयं
कृष्ण उसके भाई के रूप म घोडे पर बैठाकर बर्रामा पहुँचाने आए थे। यही कारण है कि चन्द्रसखी कृष्ण की भक्त थी व उन्हें भाई रूप में पूजती थी।"

// श्रीकृष्णार्पणमस्तु //
"डॉ. पूरन सहगल द्वारा लिखित मालवा की मीरा जो मधुमती मे प्रकाशित हुआ है इस जानकारी का स्रोत है मेरा उदेश्य मालवा के इस संत से सभी का परिचय कराना है"
आभार :डॉ. पूरन सहगल, मधुमती

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...